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इंडो-यूएस संयुक्त बयान पर मनीष तिवारी के तीखे सवाल, कहा – देश को बताया जाए क्या वादा किया

Indo-US Joint Statement

Indo-US Joint Statement

चंडीगढ़, 7 फरवरी 2026: Indo-US Joint Statement: भारत और अमेरिका के बीच 6 फरवरी को जारी संयुक्त बयान के बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद मनीष तिवारी ने समझौते में टैरिफ से जुड़ी भाषा को लेकर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है और इस मुद्दे पर संसद में व्यापक चर्चा की मांग की है।

मनीष तिवारी ने सोशल मीडिया मंच X पर लिखा कि संयुक्त बयान का एक वाक्य यह संकेत देता है कि भारत ने अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों के लिए अपने बाजार को काफी हद तक खोलने पर सहमति दे दी है। उन्होंने सवाल किया कि क्या इसका मतलब यह समझा जाए कि भारत ने इन क्षेत्रों में अमेरिका को लगभग बिना रोक-टोक प्रवेश देने का वादा किया है।

संयुक्त बयान में कहा गया है कि भारत अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं पर टैरिफ समाप्त या कम करेगा और अमेरिकी खाद्य एवं कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर भी शुल्क घटाएगा, जिनमें डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स (DDGs), पशु चारे के लिए लाल ज्वार, ट्री नट्स, ताजे और प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स समेत अन्य उत्पाद शामिल हैं।

तिवारी ने विशेष रूप से “including” शब्द के उपयोग पर ध्यान दिलाया और कहा कि इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि सूची यहीं तक सीमित है या आगे और उत्पाद भी इसमें जोड़े जा सकते हैं। उनके मुताबिक यह भाषा दूरगामी और संभावित रूप से गंभीर प्रभाव पैदा कर सकती है।

कांग्रेस सांसद ने कहा कि वित्त विधेयक 2026 में पहले ही कई टैरिफ लाइनों पर रियायतें दी जा चुकी हैं। ऐसे में अब यदि अतिरिक्त कटौतियों या समाप्ति की बात हो रही है तो देश को यह जानने का अधिकार है कि बदले में भारत को क्या मिला है और घरेलू उद्योग व किसानों के हित किस तरह सुरक्षित रखे जाएंगे।
उन्होंने जोर देकर कहा कि इतने महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक असर वाले विषय पर पूर्ण पारदर्शिता जरूरी है और सरकार को संसद में विस्तृत बयान देना चाहिए।
तिवारी ने मांग की कि इस मुद्दे पर फुल-फ्लेज्ड डिबेट कराई जाए ताकि स्थिति स्पष्ट हो और किसी भी तरह की आशंका या भ्रम दूर हो सके।

सरकार का रुख

सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह एक अंतरिम व्यापार ढांचा है और अंतिम समझौते से पहले कई चरणों की बातचीत बाकी है। सरकार का दावा है कि संवेदनशील क्षेत्रों के हितों की अनदेखी नहीं की जाएगी।